अन्नपूर्णा चालीसा अन्नपूर्णा देवी को समर्पित चौबीस स्तोत्रों का संग्रह है। मैंने जब पहली बार ये पढ़ा था, तो मेरे अंदर एक अजीब सा सुकून आया जैसे किसी ने हल्की छाया में ठहरकर मुझे आराम दिया हो। सुबह उठकर या शाम को दीपक जलाकर इसे पढ़ने से मन की शांति और जीवन में संपन्नता का अनुभव होता है।
हमारी परंपरा में अन्नपूर्णा देवी को “भोजन की देवी” कहा जाता है। यह चालीसा हमें यह याद दिलाती है कि शारीरिक आहार के साथ-साथ आत्मिक पोषण भी ज़रूरी है। जब हम इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो देवी से दुआ करते हैं कि हमारा परिवार और जीवन कभी अन्न-तृष्णा से परेशान न हो।
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माँ अन्नपूर्णा चालीसा
।। दोहा ।।
विश्वेश्वर पदपदम की रज निज शीश लगाय ।
अन्नपूर्णे, तव सुयश बरनौं कवि मतिलाय ।
।। चौपाई ।।
नित्य आनंद करिणी माता,
वर अरु अभय भाव प्रख्याता ॥
जय ! सौंदर्य सिंधु जग जननी,
अखिल पाप हर भव-भय-हरनी ॥
श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि,
संतन तुव पद सेवत ऋषिमुनि ॥
काशी पुराधीश्वरी माता,
माहेश्वरी सकल जग त्राता ॥
वृषभारुढ़ नाम रुद्राणी,
विश्व विहारिणि जय ! कल्याणी ॥
पतिदेवता सुतीत शिरोमणि,
पदवी प्राप्त कीन्ह गिरी नंदिनि ॥
पति विछोह दुःख सहि नहिं पावा,
योग अग्नि तब बदन जरावा ॥
देह तजत शिव चरण सनेहू,
राखेहु जात हिमगिरि गेहू ॥
प्रकटी गिरिजा नाम धरायो,
अति आनंद भवन मँह छायो ॥
नारद ने तब तोहिं भरमायहु,
ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु ॥ 10 ॥
ब्रहमा वरुण कुबेर गनाये,
देवराज आदिक कहि गाये ॥
सब देवन को सुजस बखानी,
मति पलटन की मन मँह ठानी ॥
अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या,
कीहनी सिद्ध हिमाचल कन्या ॥
निज कौ तब नारद घबराये,
तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये ॥
करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ,
संत बचन तुम सत्य परेखेहु ॥
गगनगिरा सुनि टरी न टारे,
ब्रहां तब तुव पास पधारे ॥
कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा,
देहुँ आज तुव मति अनुरुपा ॥
तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी,
कष्ट उठायहु अति सुकुमारी ॥
अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों,
है सौगंध नहीं छल तोसों ॥
करत वेद विद ब्रहमा जानहु,
वचन मोर यह सांचा मानहु ॥ 20 ॥
तजि संकोच कहहु निज इच्छा,
देहौं मैं मनमानी भिक्षा ॥
सुनि ब्रहमा की मधुरी बानी,
मुख सों कछु मुसुकाय भवानी ॥
बोली तुम का कहहु विधाता,
तुम तो जगके स्रष्टाधाता ॥
मम कामना गुप्त नहिं तोंसों,
कहवावा चाहहु का मोंसों ॥
दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा,
शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा ॥
सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये,
कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये ॥
तब गिरिजा शंकर तव भयऊ,
फल कामना संशयो गयऊ ॥
चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा,
तब आनन महँ करत निवासा ॥
माला पुस्तक अंकुश सोहै,
कर मँह अपर पाश मन मोहै ॥
अन्न्पूर्णे ! सदापूर्णे,
अज अनवघ अनंत पूर्णे ॥ 30 ॥
कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ,
भव विभूति आनंद भरी माँ ॥
कमल विलोचन विलसित भाले,
देवि कालिके चण्डि कराले ॥
तुम कैलास मांहि है गिरिजा,
विलसी आनंद साथ सिंधुजा ॥
स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी,
मर्त्य लोक लक्ष्मी पदपायी ॥
विलसी सब मँह सर्व सरुपा,
सेवत तोहिं अमर पुर भूपा ॥
जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा,
फल पाइंहहि शुभ साखी ईसा ॥
प्रात समय जो जन मन लायो,
पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अघिकायो ॥
स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत,
परमैश्रवर्य लाभ लहि अद्भुत ॥
राज विमुख को राज दिवावै,
जस तेरो जन सुजस बढ़ावै ॥
पाठ महा मुद मंगल दाता,
भक्त मनोवांछित निधि पाता ॥ 40 ॥
।। दोहा ।।
जो यह चालीसा सुभग,
पढ़ि नावैंगे माथ ।
तिनके कारज सिद्ध सब,
साखी काशी नाथ ॥

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अन्नपूर्णा चालीसा का महत्व
हमारी परंपरा में अन्नपूर्णा देवी को “भोजन की देवी” कहा जाता है। यह चालीसा हमें यह याद दिलाती है कि शारीरिक आहार के साथ-साथ आत्मिक पोषण भी ज़रूरी है। जब हम इस चालीसा का पाठ करते हैं, तो देवी से दुआ करते हैं कि हमारा परिवार और जीवन कभी अन्न-तृष्णा से परेशान न हो।
पाठ करने का समय
सबसे शुभ समय सुबह-सुबह सूर्योदय के बाद या शाम को जब दीपक जला होता है। अगर आपके पास सुबह का समय न हो, तो भोजन से पहले भी एक-दो मंत्र उच्चारण मात्र से मन को शांति मिल सकती है।
चालीसा के लाभ
आर्थिक स्थिरता: नियमित पाठ से घर में राशन-पानी की कमी का डर कम हो जाता है।
मानसिक शांति: मंत्रों का मधुर उच्चारण तनाव को दूर करता है।
आध्यात्मिक विकास: देवी का आशीर्वाद विवेक और संयम को बढ़ाता है।
मेरा अनुभव
एक बार घर में खाने-पीने की चीज़ें खत्म हो गई थीं। उस दिन मैंने चालीसा का पाठ किया, और अगले दिन अचानक एक अनजान व्यक्ति आया, जिसने कुछ राशन हमें दे दिया। उस घटना ने मुझे महसूस कराया कि देवी सही समय पर मदद भेजती हैं।
अंत में
अगर आप भी जीवन में अन्न-भोजन की स्थिरता और मन की शांति चाहते हैं, तो आज से ही अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ शुरू कर दें। धीरे-धीरे आप देखेंगे कि कैसे देवी का आशीर्वाद आपके घर में सुख-शांति लाता है।